



कृपा
Kripa
(Character in the Mahabharata, A Chiranjivi)
Summary
कृपाचार्य: महाभारत के एक अमर योद्धा और गुरु
कृपा (जिसका अर्थ है "दया") महाभारत के एक महत्वपूर्ण पात्र हैं जिन्हें कृपाचार्य के नाम से भी जाना जाता है। वह कौरवों और पांडवों दोनों के गुरु थे और कुरु राज्य के एक महत्वपूर्ण सलाहकार थे।
कृपा का जन्म असाधारण परिस्थितियों में हुआ था। उनके पिता महर्षि शरद्वान और माता अप्सरा जनापदी थीं। शरद्वान ने अपनी तपस्या से इंद्र को प्रसन्न किया था और इंद्र ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया था। लेकिन इंद्र ने यह भी कहा था कि उनका पुत्र एक महान योद्धा होगा लेकिन क्रोधी स्वभाव का भी होगा। इसी भय से शरद्वान ने अपने पुत्र को जंगल में तीरों के साथ छोड़ दिया।
एक दिन राजा शन्तनु शिकार खेलते हुए उस जंगल में पहुंचे और उन्होंने उस बच्चे को देखा। बच्चे के पास रखे तीरों को देखकर उन्हें आभास हुआ कि यह कोई साधारण बच्चा नहीं है। उन्होंने उस बच्चे को अपने साथ ले जाकर उसका नाम कृपा रखा और उसे अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
कृपाचार्य ने अपने पिता शरद्वान से ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की और अपने पिता की तरह ही वे भी एक महान धनुर्धर बने। उन्होंने कौरवों और पांडवों दोनों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी।
महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की ओर से लड़े थे। हालाँकि उनका ह्रदय पांडवों के साथ था, परन्तु वे अपने कर्तव्य से बंधे हुए थे। वे कुरुक्षेत्र युद्ध में जीवित बचे कुछ योद्धाओं में से एक थे।
हिन्दू मान्यता के अनुसार, कृपाचार्य चिरंजीवी हैं, अर्थात वे इस युग के अंत तक जीवित रहेंगे। कुछ ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि अगले मन्वन्तर में वे सप्तऋषियों में से एक होंगे।

