त्रेता युग
Treta Yuga
(Second of four yugas (ages) in Hindu cosmology)
Summary
त्रेता युग: एक विस्तृत विवरण (Treta Yuga: A Detailed Description)
हिन्दू धर्म में, समय को चार युगों में विभाजित किया गया है: सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग। यह क्रम एक चक्र के रूप में चलता रहता है। इनमे त्रेता युग दूसरा युग होता है और इसे सतयुग के बाद सबसे उत्तम युग माना जाता है।
त्रेता युग की अवधि: यह युग 12,96,000 मानव वर्षों तक चलता है, जो कि 3,600 दिव्य वर्षों के बराबर है।
नामकरण: "त्रेता" संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है "तीन का समूह"। इसका नाम त्रेता युग इसलिए पड़ा क्योंकि इस युग में भगवान विष्णु ने तीन अवतार लिए थे:
- पाँचवा अवतार: वामन
- छठा अवतार: परशुराम
- सातवाँ अवतार: राम
धर्म की स्थिति: त्रेता युग में धर्म चार पैरों वाले बैल से तीन पैरों वाले बैल के रूप में स्थापित था। इसका अर्थ है कि इस युग में धर्म का कुछ हंस हुआ था लेकिन फिर भी यह सतयुग की तुलना में मजबूत था। सतयुग में धर्म चारों पैरों पर मजबूती से खड़ा था। त्रेता युग के बाद आने वाले द्वापर युग में धर्म के दो पैर रह जाते हैं और वर्तमान कलियुग में धर्म एक ही पैर पर अस्थिर रूप से खड़ा है।
त्रेता युग का महत्व: इस युग को रामायण जैसे महान ग्रंथ के रचित होने के लिए जाना जाता है। यह युग भगवान राम के आदर्शों, उनके शौर्य और त्याग की गाथा के लिए प्रसिद्ध है जो आज भी मानवता के लिए प्रेरणा स्रोत है।