Joga_Pradīpikā

जोग प्रदीपिका

Joga Pradīpikā

(1731 Indian yoga text)

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योगप्रदीपिका: योग का प्रकाश

"योगप्रदीपिका" का अर्थ है "योग पर एक छोटा सा प्रकाश"। यह एक प्रसिद्ध हठ योग ग्रंथ है जो जयतराम जी द्वारा १७३७ में लिखा गया था। जयतराम जी रामानंदी संप्रदाय के अनुयायी थे। यह ग्रंथ हिंदी, ब्रज भाषा, खड़ी बोली और संस्कृत के मिश्रण में लिखा गया है, जो उस समय की भाषा शैली को दर्शाता है।

यह ग्रंथ हठ योग के छः शोधन क्रियाओं, चौरासी आसनों, चौबीस मुद्राओं और आठ कुम्भकों का विस्तार से वर्णन करता है:

  • षट्कर्म (छः शोधन क्रियाएँ): ये क्रियाएँ शरीर को शुद्ध करने के लिए होती हैं और योग साधना के लिए तैयार करती हैं।
  • चौरासी आसन: योगप्रदीपिका में अस्सी-चार आसनों का वर्णन है जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माने जाते हैं।
  • चौबीस मुद्राएँ: मुद्राएँ हाथों, उंगलियों और शरीर के अन्य अंगों से बनाई जाने वाली विशिष्ट मुद्राएँ हैं जो प्राण ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
  • आठ कुम्भक: कुम्भक प्राणायाम की एक क्रिया है जिसमें सांस को रोक कर रखा जाता है। यह मन को शांत करने और एकाग्रता बढ़ाने में सहायक है।

१८३० में इस ग्रंथ की एक पांडुलिपि तैयार की गई थी जिसमें चौरासी आसनों को चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है। यह पांडुलिपि ग्रंथ रचना के लगभग सौ साल बाद बनाई गई थी और यह हमें उस समय प्रचलित योग आसनों की शैली और समझ को समझने में मदद करती है।

आज भी "योगप्रदीपिका" हठ योग के प्रमुख ग्रंथों में से एक माना जाता है और योग साधकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संसाधन है।


The Joga Pradīpikā is a hatha yoga text by Ramanandi Jayatarama written in 1737 in a mixture of Hindi, Braj Bhasa, Khari Boli and forms close to Sanskrit. It presents 6 cleansing methods, 84 asanas, 24 mudras and 8 kumbhakas. The text is illustrated in an 1830 manuscript with 84 paintings of asanas, prepared about a hundred years after the text.



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